कालजयी स्थापना इतिहास का सुधारात्मक कदम है : अनुप बरनवाल

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लखनऊ:  उच्च न्यायालय अधिवक्ता अनुप बरनवाल भारत द्वार के बारे ब्याख्या करते हुए कहा कि शायद ‘काल-चक्र’ की नियति ने तय कर लिया था कि आजाद भारत के संबंध में ‘नेताजी का कद’ 10-20 साल की सत्ता-शासन के चकाचौंध और भारत-रत्न के प्रतीकात्मक-सम्मान से बहुत ज्यादा बड़ा है।

कांग्रेस में बाकी सभी डोमिनियन स्टेट्स के लिए भी तैयार थे, किन्तु यह ‘नेताजी’ थे, जिन्हें पूर्ण स्वराज से कम कुछ स्वीकार नहीं था और राष्ट्रमुक्ति के लिए अपना अलग रास्ता अपना लिया।

‘नेताजी’ तो 1938 में प्रचण्ड बहुमत से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर चुने गए थे, किन्तु यह ‘नेताजी’ थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान में इस पद को ठोकर मार दी और पूर्ण स्वराज के लिए अपना संपूर्ण जीवन न्यौछावर कर दिया।

एकतरफ महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय चेतना जागृत हो रहा था, तो दूसरी तरफ द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुश्वारियां पैदा हो रही थी। किन्तु यह ‘नेताजी’ ही थे, जिनकी प्रबल इच्छा शक्ति के सामने ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान विद्रोह करने लगे और ब्रिटिश हुकूमत घुटना टेकने के लिए मजबूर हुआ।

और यही कारण है कि कालचक्र ‘नेताजी’ की आभामयी योगदान के साथ किए गए सौतेले व्यवहार की भरपाई अब पूरे जतन के साथ करने का मन बनाया है। अब उनकी भव्य प्रतिमा ‘भारत-द्वार’ (इण्डिया गेट) के समक्ष विराजमान होगा।

कालचक्र ने यह तय कर दिया था कि आजादी मिलने के बाद भी इस देश के तत्कालीन नेतृत्व को यह सद्बुद्धि नहीं आएगी कि अधिनायकवाद एवं विस्तारवाद के इन्सानी-प्रतीक किंग जार्ज पंचम की प्रतिमा को हटा देना चाहिए। अन्यथा तत्काल परिस्थितियों में इस स्थान पर कोई और नहीं, बल्कि महात्मा गांधी जी होते। कालचक्र के इस नियति के अधीन यह देश 18 वर्षों तक अपमान झेलता रहा।

बाद के सत्ताशीन लोगों में, जिन्होंने खुद ही को भारतरत्न लेने-देने की होड़ से आत्ममुग्ध कर लिया था, राजनीतिक मर्यादा ही शेष नहीं बचा था कि वे इस खाली स्थान के लिए उपयुक्त व्यक्ति की तलाश कर पाते। अन्यथा जार्ज पंचम की प्रतिमा हटाए जाने के बाद यह स्थान पिछले 54 वर्षों तक खाली न रहता। किन्तु ऐसा होना कालचक्र की नियति ही थी, जिसने नेताजी की प्रतिमा के इस कालजयी स्थापना हेतु वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुना है।

यह कालचक्र की नियति ही थी कि भारतीयों के हृदयमन में विद्यमान ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस’ अब भारत-द्वार के इस हृदयस्थल पर भी विराजमान किए जाए। ताकि वह प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या भारतरत्न के किसी सूची से अलग सबसे ऊपर हों।

‘भारत-द्वार’ पर ‘नेताजी’ की भव्य प्रतिमा की स्थापना उनकी उस महानता की भी गाथा सुनाता रहेगा, जिसके कारण उन्होंने तमाम वैचारिक मतभेद के बावजूद महात्मा गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया था।

यह कालजयी स्थापना वैश्विक परिदृश्य में इस देश के बदलते स्वरूप का भी दर्शन कराएगा, जो वैश्विक कल्याण के लिए अब ‘शांति’ और ‘शक्ति’ दोनों पर समान रूप से भरोसा करने लगा है।

यह हमारा सौभाग्य है कि हम सभी के नजरों के सामने भारत राष्ट्र ‘नेताजी सुभाष चन्द्र बोस’ को उनकी 125वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु यह ‘कालजयी स्थापना’ कर रहा है।

आइये, इस कालजयी स्थापना को मनसा वाचा कर्मणा आत्मसात् करें और आजादी आंदोलन के महानायकों द्वारा हासिल स्वराज को अछुण बनाए रखने और इसे सुराजमूलक बनाने के लिए कृत संकल्पित होवें।


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