साइकिल यदि कीचड़ में फंसी तो कमल का खिलना तय- डॉ अमित मिश्रा(राजनीतिक विश्लेषक)

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जन ज़ोश न्यूज

देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव अपने चरम पर है ऐसे में सियासी पारा का चढ़ना और उतरना लगातार जारी है। इन दिनों देश के सबसे बड़े आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश में भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। ज्यों ज्यों चुनाव की तारीखें नजदीक आ रही है त्यों त्यों सियासत में ऊबाल देखा जा रहा है। यह ऐसा प्रदेश हैं जहां कि सियासत दिल्ली की सियासत को प्रभावित करता है क्योंकि यह राज्य जनसंख्या की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है जिसकी दखल अंदाजी केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को भी बर्दाश करनी पड़ती हैं अतः उत्तर प्रदेश का चुनाव हर पार्टी के लिए जीतना मायने रखता है। उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीट है। सभी पार्टी प्रमुख अपनी पार्टी के जीत का दावा कर रहे हैं। इस बीच ए बी पी न्यूज़ पोल ऑफ पोल्स एक सर्वे लेकर आया है जिसमें आठ एजेंसियों ने मिलकर चुनावी सर्वे किया है। जिसमें दावा किया गया है कि बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बनायेगी। लेकिन समाजवादी पार्टी को भी इसमें कमतर नहीं आंका गया है । वहीं 20 लाख नौकरियों वाले कांग्रेस के दावे में कितना दम है यह 10 मार्च को पता चलेगा। हालांकि प्रियंका गांधी ने जब से पार्टी की कमान संभाली है तब से युवाओं और महिलाओं का झुकाव उस ओर देखा जा रहा है लेकिन फिर भी 33 सालों पूर्व खोई प्रतिष्ठा पार्टी को वापस लौटाना प्रियंका गांधी के लिए एक बड़ा चुनौती है जिसे प्रियंका ने सहज रूप से स्वीकार किया है जिससे लगता है कि कांग्रेस की प्रदेश में वापसी मुश्किल नहीं। प्रदेश में अब जगह जगह कांग्रेस की आस जगी है। दुसरी तरफ बीएसपी में माया की चुप्पी को सिरे से नकारना बीजेपी के लिए या समाजवादी पार्टी दोनों के लिए नासूर बन सकता हैं। पिछले लोकसभा में पूर्वांचल के 23 जिलों में से एनडीए को 12 सीट मिली साथ ही अन्य पर वह टक्कर की स्थिति में था परन्तु इस बार अखिलेश यादव के पूर्वांचल आने से हवा का रुख़ बदल सकता हैं क्योंकि पूर्वांचल के अधिकांश मुस्लिम समुदाय का झुकाव साइकिल की ओर हैं ऐसा सर्वे कहता है। महिलाओं को तरजीह देने के मामले में कांग्रेस की पहल का लोगों ने स्वागत किया है जिससे पार्टी में उम्मीद जगी है लेकिन पार्टी को अभी भी जमीनी स्तर पर कार्य करने की जरूरत है। प्रदेश में यदि मुस्लिम समुदाय बल पर दृष्टि डालें तो प्रदेश में लगभग 20 से 22 फीसदी मुस्लिम आबादी है जिसपर सभी पार्टियों की नज़र हैं। पार्टियों ने मुस्लिम वोट ध्रुवीकरण के लिए कई ऐसे मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है जिनकी छवि दबंगों वाली है ऐसे उम्मीदवार लगभग हर पार्टी में हैं। ऐसे में यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मुस्लिमों का झुकाव साइकिल पर हैं। एक तरफ ओवैसी भी धर्म और मज़हब की दुहाई देकर मुस्लिमों को अपने खेमें में करने की जुगत में हैं हालांकि यदि ऊट करवट लेता है तो इसका खामियाजा सपा को भुगतना पड़ेगा। साथ ही बीजेपी से स्वामी प्रसाद मौर्य के समाजवादी पार्टी में आने से पार्टी को फायदा हो सकता है लेकिन यह फायदा कितना परिवर्तनकारी होगा यह परिणाम घोषित होने के बाद ही स्पष्ट होगा। दूसरी ओर मुलायम सिंह की बहू ने भी अपने परिवार से नाता तोड़कर राष्ट्रवाद को गले लगाया है फिर भी बीजेपी में बहू अर्पणा के आने से पार्टी को कोई खास फायदा नहीं होगा। उल्टे नुकसान की संभावना प्रबल है, हालांकि यदि सपा परिवार से इसी तरह लोगों का पलायन होता रहा तो फिर साइकिल का कीचड़ में फंसना तय है और कमल को खिलने से कोई नहीं रोक सकता।


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